१ आॅगस्ट १७७४
जोसेफ प्रीस्टली व कार्ल विल्हेमने ऑक्सिजन मूलतत्त्वाचा शोध लावला
प्राणवायू (ऑक्सिजन) हे एक अधातू मूलद्रव्य आहे. प्राणवायू हा नावप्रमाणेच प्राणिमात्रांच्या जीवनासाठी आवश्यक आहे. हा वायू सामान्य तापमानास वायुरूपात असतो. पृथ्वीच्या वातावरणात प्राणवायूचे प्रमाण सुमारे २१% आहे. प्राणवायूच्या एका अणूमध्ये ८ प्रोटॉन, ८ इलेक्ट्रॉन आणि ८ न्यूट्रॉन असतात. प्राणवायू नेहमी रेणूच्या स्वरूपात आढळतो. प्राणवायूच्या एका रेणूमध्ये २ अणू असतात. त्यामुळे त्याची रासायनिक सारणी O2 अशी लिहितात.
प्राणवायूची सजीवांच्या श्वसनक्रियेत महत्त्वाची भूमिका आहे.
अज्ञात की खोज इन्सान की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अज्ञात की खोज करते हुए इन्सान को उसकी विचारक्षमता साथ देती है। सोच, क्रियाशक्ति एवं प्रयोगशीलता की निरंतरता एवं संग से विज्ञान के खोजों की श्रृंखला चलती रहती है।
ऑक्सिजन की खोज करनेवाले संशोधक में जोसेफ प्रिस्टले का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रिस्टले का कार्य केवल ऑक्सिजन की खोज तक ही सीमित नहीं है बल्कि उन्होंने ऑक्सिजन-कार्बनडाय ऑक्साईड की श्रृंखला किस तरह से कार्य करती है इसे प्रमाण के साथ पेश किया।
उन्होंने प्रक्रिया में निर्माण होनेवाला वायु जमा करके उस में जलता हुआ टुकडा रखा और वह बुझ गया। वह वायु कार्बन-डाय-ऑक्साईड था। कार्बन-डाय-ऑक्साई वायु को उन्होंने पानी में घोला तो उस का स्वाद मधुर, तीव्र गंध की तरह था। इस से सोडा वॉटर की खोज हुई।
सन १७७२ में वे फ्रेंच अकादमी ऑफ सायन्स के सदस्य बने और सन १७७३ में उन्हें रॉयल सोसायटी से पदक प्रदान किया गया। तत्पश्चात ऑक्सिजन की खोज हुई। ऑक्सिजन बनाने के लिए फैले हुए बर्तन में पारा लेकर उस में कटोरी वाला स्टैंड खडा किया गया। कटोरी में मर्क्युरिक ऑक्साईड विघटन हुआ और वह पारे में परिवर्तित हो गया। उन्होंने इस वायु को ‘ज्वलनतत्त्वरहित हवा’ का नाम दिया। वायु निर्माण होने की वजह से पारे का स्तर नीचे चला गया। उन्होंने जलती हुई मोमबत्ती इस वायु में आसानी से रख दी और चकाचौंद रोशनी हो गई। अर्थात यह ऑक्सीजन वायु था।
वनस्पती व प्राणियों के बीच प्राणवायु की श्रृंखला भी प्रिस्टले द्वारा साबित किया हुआ एक प्रयोग था। एक बडी हांडी में एक वनस्पती रखी गई। उस हांडी में से प्राणवायु को ज्वलनक्रिया से निकाला गया। उसी हांडी में कुछ दिनों बाद जलती हुई मोमबत्ती फिर से रखी गई और वह मोमबत्ती अच्छी तरह से जलने लगी। इस निरिक्षंण से उन्हें पता चला कि वनस्पती जब सांस छोडती हैं तब ऑक्सिजन बाहर निकालती हैं, मगर प्राणी सांस लेते समय ऑक्सिजन अंदर लेते हैं।
प्रिस्टले को ‘प्रथम मानव’ कहा जाना चाहिए कि जिन्होंने वनस्पती के श्वसन का निरिक्षण किया। वनस्पती एवं प्राणी में से एकदूसरे पर निर्भर रहनेवाले चक्र की जानकारी प्रतिपादित की।
सन १७७२ में एक प्रयोग द्वारा उन्होंने नई गैस (वायुरूप द्रव्य) की खोज की। उन्होंने नाइट्रस ऑक्साईड जैसा विचित्र परिणाम करनेवाला वायु ढूंढ निकाला। इसे लाफिंग गैस के नाम से भी जाना जाता है। कुछ अरसे बाद यह गैस ऑपरेशन के लिए अचेत करनेवाले गैस के रूप में जाना जाने लगा है। मगर यह खोज बाद में हुई है।
जोसेफ प्रिस्टले को कार्बनडायऑक्साईड, नायट्रस ऑक्साईड, ऑक्सिजन ढूंढने में कामयाबी हासिल हुई। गैसमिश्रित सौम्य पान (सोडा पॉप) की खोज की। पहले फोटोसिनथेसिस का निरिक्षण किया, मगर वे इतने में ही संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अमोनिया, सल्फर-डाय-ऑक्साईड, हायड्रोजन सल्फाईड, कार्बन मोनोऑक्साईड पहले अलग करके उस की जानकारी दी।
जोसेफ प्रीस्टली व कार्ल विल्हेमने ऑक्सिजन मूलतत्त्वाचा शोध लावला
प्राणवायू (ऑक्सिजन) हे एक अधातू मूलद्रव्य आहे. प्राणवायू हा नावप्रमाणेच प्राणिमात्रांच्या जीवनासाठी आवश्यक आहे. हा वायू सामान्य तापमानास वायुरूपात असतो. पृथ्वीच्या वातावरणात प्राणवायूचे प्रमाण सुमारे २१% आहे. प्राणवायूच्या एका अणूमध्ये ८ प्रोटॉन, ८ इलेक्ट्रॉन आणि ८ न्यूट्रॉन असतात. प्राणवायू नेहमी रेणूच्या स्वरूपात आढळतो. प्राणवायूच्या एका रेणूमध्ये २ अणू असतात. त्यामुळे त्याची रासायनिक सारणी O2 अशी लिहितात.
प्राणवायूची सजीवांच्या श्वसनक्रियेत महत्त्वाची भूमिका आहे.
अज्ञात की खोज इन्सान की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अज्ञात की खोज करते हुए इन्सान को उसकी विचारक्षमता साथ देती है। सोच, क्रियाशक्ति एवं प्रयोगशीलता की निरंतरता एवं संग से विज्ञान के खोजों की श्रृंखला चलती रहती है।
ऑक्सिजन की खोज करनेवाले संशोधक में जोसेफ प्रिस्टले का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। प्रिस्टले का कार्य केवल ऑक्सिजन की खोज तक ही सीमित नहीं है बल्कि उन्होंने ऑक्सिजन-कार्बनडाय ऑक्साईड की श्रृंखला किस तरह से कार्य करती है इसे प्रमाण के साथ पेश किया।
उन्होंने प्रक्रिया में निर्माण होनेवाला वायु जमा करके उस में जलता हुआ टुकडा रखा और वह बुझ गया। वह वायु कार्बन-डाय-ऑक्साईड था। कार्बन-डाय-ऑक्साई वायु को उन्होंने पानी में घोला तो उस का स्वाद मधुर, तीव्र गंध की तरह था। इस से सोडा वॉटर की खोज हुई।
सन १७७२ में वे फ्रेंच अकादमी ऑफ सायन्स के सदस्य बने और सन १७७३ में उन्हें रॉयल सोसायटी से पदक प्रदान किया गया। तत्पश्चात ऑक्सिजन की खोज हुई। ऑक्सिजन बनाने के लिए फैले हुए बर्तन में पारा लेकर उस में कटोरी वाला स्टैंड खडा किया गया। कटोरी में मर्क्युरिक ऑक्साईड विघटन हुआ और वह पारे में परिवर्तित हो गया। उन्होंने इस वायु को ‘ज्वलनतत्त्वरहित हवा’ का नाम दिया। वायु निर्माण होने की वजह से पारे का स्तर नीचे चला गया। उन्होंने जलती हुई मोमबत्ती इस वायु में आसानी से रख दी और चकाचौंद रोशनी हो गई। अर्थात यह ऑक्सीजन वायु था।
वनस्पती व प्राणियों के बीच प्राणवायु की श्रृंखला भी प्रिस्टले द्वारा साबित किया हुआ एक प्रयोग था। एक बडी हांडी में एक वनस्पती रखी गई। उस हांडी में से प्राणवायु को ज्वलनक्रिया से निकाला गया। उसी हांडी में कुछ दिनों बाद जलती हुई मोमबत्ती फिर से रखी गई और वह मोमबत्ती अच्छी तरह से जलने लगी। इस निरिक्षंण से उन्हें पता चला कि वनस्पती जब सांस छोडती हैं तब ऑक्सिजन बाहर निकालती हैं, मगर प्राणी सांस लेते समय ऑक्सिजन अंदर लेते हैं।
प्रिस्टले को ‘प्रथम मानव’ कहा जाना चाहिए कि जिन्होंने वनस्पती के श्वसन का निरिक्षण किया। वनस्पती एवं प्राणी में से एकदूसरे पर निर्भर रहनेवाले चक्र की जानकारी प्रतिपादित की।
सन १७७२ में एक प्रयोग द्वारा उन्होंने नई गैस (वायुरूप द्रव्य) की खोज की। उन्होंने नाइट्रस ऑक्साईड जैसा विचित्र परिणाम करनेवाला वायु ढूंढ निकाला। इसे लाफिंग गैस के नाम से भी जाना जाता है। कुछ अरसे बाद यह गैस ऑपरेशन के लिए अचेत करनेवाले गैस के रूप में जाना जाने लगा है। मगर यह खोज बाद में हुई है।
जोसेफ प्रिस्टले को कार्बनडायऑक्साईड, नायट्रस ऑक्साईड, ऑक्सिजन ढूंढने में कामयाबी हासिल हुई। गैसमिश्रित सौम्य पान (सोडा पॉप) की खोज की। पहले फोटोसिनथेसिस का निरिक्षण किया, मगर वे इतने में ही संतुष्ट नहीं हुए। उन्होंने अमोनिया, सल्फर-डाय-ऑक्साईड, हायड्रोजन सल्फाईड, कार्बन मोनोऑक्साईड पहले अलग करके उस की जानकारी दी।

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